*🏹!! ओ३म् !!🏹*
*🪷शुभम् सुप्रभातम् 🪷*
*🌻अमृत पञ्चाङ्ग - ३७२२🌻*
*🪔🇮🇳आज का पञ्चाङ्ग 🇮🇳🪔*
*🇮🇳तिथि.............षष्ठी (०६.०९)*
*🪷तत्पश्चात..................सप्तमी*
*🪔वार..................बृहस्पतिवार*
*🇮🇳पक्ष...........................कृष्ण*
*🪷नक्षत्र....शतभिषा/पूर्वभाद्रपद*
*🪔करण........ वाणिज/विष्टिभद्र*
*🇮🇳 योग............प्रीति/आयुष्मान*
*🪔निशितामुहूर्त..००.२२-०१.०३*
*🪷ब्राह्ममुहूर्त......०४.३३-०५.१८*
*🇮🇳अमृतमुहूर्त.......०७.११-८.५५*
*🪄शुभ मुहूर्त......१०.३८-१२.२२*
*🪷अशुभमुहूर्त....१२.२२-१४.०४*
*🇮🇳अभिजीत......१२.१५-१३.१०*
*🪔राहुकाल........१५.०१-१६.५०*
*🪷सूर्योदय.....................०५.५५*
*🇮🇳सूर्यास्त.....................१९.२९*
*🪔मास........................आषाढ़*
*🪷ऋतु...........................ग्रीष्म*
*🇮🇳आयण.................उत्तरायण*
*🇮🇳सृष्टि संवत....१९६०८५३१२५*
*🪔कलियुगाब्द...............५१२६*
*🪷बौद्ध संवत्................२५६८*
*🇮🇳महावीर संवत्............२५५२*
*🪔विक्रम संवत्..............२०८१*
*🪷शाके........................१९४६*
*🇮🇳नानकशाही.................५५३*
*🪔शिवा पातशाही............३५०*
*🪷ऋषि दयानन्दाब्द..........२०१*
*🙏२७ जून २०२४ ईस्वी*
*🙌आज का दिन हम सभी के लिए*
*सुखमय एवम् मंगलमय हो।*
🇮🇳⛱️🇮🇳⛱️🇮🇳⛱️🇮🇳⛱️🇮🇳⛱️
*🙌!! ओ३म् !!🙌*
*👑२०२७ में मोदी राष्ट्रपति और योगी होंगे प्रधानमंत्री ?*
*🇮🇳 राष्ट्रभक्ति गीत...*
*🎷 संघशक्ति गीत...*
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*⛳जय भारत🌞वंदे मातरम् ⛳*
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*🥁हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयत्व है🥁*
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*🤩सहसा विदधीत न क्रियाम*
*विवेकः परमापदां पदम्।*
*वृणते हि विमृश्यकारिणं*
*गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः।।*
*👌भावार्थ :- जीवन में कभी भी भावावेश अथवा अतिउत्साह में आकर कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि आवेश व उत्साह में अविवेक भी उत्पन्न होता है और अविवेक ही अनेक विपत्तियों का कारण बनता है। जो व्यक्ति सोच समझकर, धैर्यपूर्वक कार्य करता है, वही सदैव सुखी एवं समृद्घ रहता है।*
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*🪷 हम सबका दिन मंगलमय हो 🪷*
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*💐हर दिन पावन*
"२७ जून/जन्मदिवस"
*🌹 सुगंधित गुलाब जैसे स्वभाव के श्री गुलाबचंद खंडेलवाल उपाख्य दादा भाई जी*
*👴श्री गुलाबचंद खंडेलवाल (दादा भाई) का जन्म २७ जून, १९२२ को ग्राम चारमंडी( जिला सीहोर, म.प्र.) में हुआ था। इनके पिता श्री राधाकृष्ण तथा माता श्रीमती मूलीबाई थीं। इंदौर के होल्कर कॉलिज में पढ़ते समय १९३७ में वे संघ के स्वयंसेवक बने। दादाभाई को संघ के संस्थापक पूज्य डा. केशवराव हेडगेवार के दर्शन करने का भी सौभाग्य मिला था।*
इसलिए अनेक संकटों और झंझटों के बावजूद संघ से उनका यह नाता जीवन भर चलता रहा। दादा भाई ने संघ में गटनायक से लेकर विभाग कार्यवाह और फिर प्रांत के सह व्यवस्था प्रमुख जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने अपने छोटे भाई प्यारेलाल खंडेलवाल को भी स्वयंसेवक और फिर प्रचारक बनाया।
*👊संघ से प्राप्त देशभक्ति के संस्कारों के कारण १९४२ के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में दादा भाई ने भी भाग लिया। स्वाधीनता के बाद उन्होंने १९६६ तक भारत सरकार के जनगणना विभाग में नौकरी कर परिवार का भरण-पोषण किया। १९७५ के आपातकाल के समय वे पूरे समय जेल में रहे। वहाँ भी वे भोजनालय विभाग के प्रमुख थे।*
इस बीच में ही उनकी बेटी का विवाह हुआ, जिसके लिए शासन ने केवल तीन दिन का पेरोल स्वीकृत किया। दादा भाई बाहर आकर विवाह की व्यवस्था में लग गये। प्रचारक के नाते उनके छोटे भाई प्यारेलाल जी भी भूमिगत थे। दोनों भाई दुबले-पतले थे और दोनों का चेहरा भी एक सा ही था।
*⛳दादा भाई की बेटी के विवाह के बाद पुलिस वालों ने दादा भाई को ही छोटा भाई प्यारेलाल समझ कर फिर से पकड़ लिया। जब थाने में पहुँचकर दादा भाई ने अपने पेरोल के कागज प्रस्तुत किये, तब पुलिस वाले अपना सिर पीट कर रह गये। जब दादा भाई के बच्चों ने घरेलू काम सँभाल लिये, तो १९८७ में वे 'विश्व हिन्दू परिषद' में पूरा समय देने लगे। वे अपने जीवन के चार सूत्र बताते थे। कम खाना, गम खाना, नम जाना और खप जाना।*
अर्थात बहुत कम भोजन करना, अपने निजी दुखों को मन में रखना, सबसे नम्रता का व्यवहार करना और जो काम दिया जाए, उसमें पूरी शक्ति लगा देना। इन सूत्रों का पालन करते हुए वे सदा स्वस्थ रहे। वे चाय, काफी, शीतल पेय आदि भी नहीं पीते थे।
*🍪दिन में एक बार हल्का भोजन, सुबह पपीता और रात को गोदुग्ध, यही उनका आहार था। प्रतिदिन प्राणायाम, आसन, विष्णु सहस्रनाम का जप करने और क्रोध, गुटबाजी व मनमुटाव से दूर रहने का नियम भी उन्होंने जीवन भर निभाया। दादा भाई के जीवन में एक कठिन क्षण तब आया, जब १९९२ में उनके बड़े पुत्र दीपक की सड़क दुर्घटना में असामयिक मृत्यु हो गयी।*
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन उस दिनों चरम पर था और दादा भाई उसकी बैठक के लिए दिल्ली में थे। यह समाचार सुनकर स्थितप्रज्ञ की भाँति उन्होंने घर आकर सब आवश्यक कार्य निपटाए और फिर पूर्ववत संगठन कार्य में लग गये। उनकी कर्मठता से उनकी पत्नी और पुत्रवधू ने भी इस संकट को साहस से झेल लिया।
*👩❤️👨 गृहस्थ होते हुए भी दादा भाई को धन-सम्पदा से भी कोई मोह नहीं था। जब गाँव में उनका पैतृक मकान बिका, तो अपने हिस्से आये धन का बड़ा भाग उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद और अन्य संगठनों को दे दिया। उनके छोटे भाई प्यारेलाल खंडेलवाल भाजपा में सांसद एवं कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे; पर केन्द्र या म.प्र. की सरकार से लाभ लेने का विचार कभी उनके मन में नहीं आया।*
🔥विश्व हिन्दू परिषद में रहते हुए वे गोसेवा विभाग में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे। म.प्र. में गोसेवा आयोग बनने पर उन्हें उसका सदस्य बनाया गया। सदा स्वस्थ और प्रसन्न रहने वाले दादा भाई को एक सितम्बर को सीने में दर्द एवं हृदयाघात के कारण चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, जहाँ अगले दिन ०२ सितम्बर, २०१० को उन्होंने देह त्याग दी।
*(संदर्भ :- हिन्दू उदय और अभिनंदन स्मारिका, २००६ से उद्धृत)*
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*🌼 हर दिन पावन*
"२७ जून/पुण्य-तिथि"
*⛳ संघकार्य के प्रति समर्पित कार्यकर्ता श्री गजेन्द्र दत्त नैथानी जी*
*🧓राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जीवनव्रती प्रचारकों की सुदीर्घ और सुदृढ़ परम्परा है। इसी के एक दैदीप्यमान नक्षत्र थे श्री गजेन्द्र दत्त नैथानी जी। उनका परिवार मूलतः पौड़ी गढ़वाल (उत्तरांचल) का था; पर उनके पूर्वज टिहरी राज्य की सेवा में आ गये थे। वहीं १९२१ में गजेन्द्र जी का जन्म हुआ।*
इसके बाद उनके पिताजी देहरादून की सुरम्य घाटी में स्थित भोगपुर गांव में आकर बस गये। उनकी आर्थिक सम्पन्नता का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां उन्होंने दो गाँव खरीद लिये थे। गजेन्द्र जी का बचपन एवं युवावस्था यहीं बीती। १९४३ में देहरादून में पढ़ते समय वे स्वयंसेवक बने।
*🪔 भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री जगदीश प्रसाद माथुर उनसे दो कक्षा आगे पढ़ते थे, वही उस सायं शाखा के मुख्यशिक्षक थे। गजेन्द्र जी ने १९४३, ४४ और फिर १९४७ में संघ शिक्षण वर्ग पूर्ण किये। उन दिनों पश्चिम उत्तर प्रदेश को दिल्ली प्रांत में माना जाता था, जिसके प्रांत प्रचारक श्री वसंतराव ओक थे।*
मेरठ में लगे प्रथम वर्ष के वर्ग में उनके ‘व्यक्ति और समाज’ विषय पर तीन बौद्धिक हुए। उनसे प्रभावित होकर गजेन्द्र जी ने पूर्णकालिक प्रचारक बनने का निर्णय लिया और फिर उसे अंतिम श्वास तक निभाया। प्रचारक बनने के बाद धामपुर, नजीबाबाद, मुजफरनगर, शाहजहांपुर और नैनीताल में संघ के विभिन्न दायित्वों पर रहकर उन्होंने काम किया।
*♻️१९६७-६८ में उन्हें 'भारतीय जनसंघ' में काम करने के लिए भेजा गया। इसके बाद तो वे लगातार राजनीतिक क्षेत्र में ही काम करते रहे। इस क्षेत्र में काम करने वालों को प्रायः चुनाव लड़ने या विधान परिषद और राज्यसभा में पहुँचने की इच्छा जाग्रत हो जाती है; पर गजेन्द्र जी ने कभी इस ओर विचार नहीं किया। उन्होंने सदा संगठन संबंधी कार्यों को ही प्राथमिकता दी।*
स्वास्थ्य संबंधी कारणों से जब प्रवास में उन्हें कठिनाई होने लगी, तो १९८९ में उन्हें लखनऊ में प्रदेश भाजपा कार्यालय का प्रभारी बनाया गया। इसके बाद तो कार्यालय और गजेन्द्र जी एकरूप हो गये। वयोवृद्ध और सर्वाधिक अनुभवी होने के कारण सब उन्हें ‘ताऊ जी’ कहते थे।
*🏘️कार्यालय पर काम करने वाले सभी कर्मचारियों से वे परिवार के सदस्यों की तरह व्यवहार करते थे। इस नाते उनका सम्बोधन ‘ताऊ जी’ सार्थक ही था। वे मधुमेह के तो लम्बे समय से रोगी थे; पर २००६ में शरीर के निचले भाग में अधरंग (पैरालेसिस) हो जाने से उनकी गतिविधियाँ थम सी गयीं।*
इसके बाद भी महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय उनसे परामर्श अवश्य किया जाता था। वे अपने अनुभव और स्पष्ट दृष्टिकोण के कारण एकदम सटीक सलाह देते थे। बीमार होने बाद भी उनके मन का उत्साह एवं आशावाद कम नहीं हुआ। उनसे मिलने आने वाला हर व्यक्ति इसे अनुभव करता था।
*👍वे कहते थे कि अपने हाथ में काम करना है, सफलता या असफलता ईश्वर के हाथ में है। इसीलिए संगठन ने जो काम उन्हें सौंपा, उसे वे अपनी पूरी शक्ति से करते थे। जब तक संभव हुआ, सुबह-शाम वे कुछ देर के लिए कार्यालय में अवश्य बैठते थे। जब कोई उनके स्वास्थ्य का हाल पूछता, तो वे हँस कर कहते -*
"इस उम्र में जैसा होना चाहिए, वैसा ही ठीक हूँ।" सहायक के माध्यम से वे व्यायाम करते और बरामदे में टहलते भी थे। ८७ वर्ष की सुदीर्घ आयु में २७ जून, २००८ की रात्रि में उन्होंने अपना जीवन सदा के लिए बदरीश भगवान के चरणों में विसर्जित कर दिया।
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*🌼 हर दिन पावन*
"२७ जून/पुण्य-तिथि"
*⛳संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री गोविंद सीताराम उपाख्य दादाराव परमार्थ जी*
*👴बात एक अगस्त, १९२० की है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जी के देहान्त के कारण पूरा देश शोक में डूबा था। संघ संस्थापक डा. केशवराव हेडगेवार किसी कार्य से घर से निकले। उन्होंने देखा कुछ लड़के सड़क पर गेंद खेल रहे हैं। डा. हेडगेवार जी क्रोध में उबल पड़े - "तिलक जी जैसे महान् नेता का देहान्त हो गया और तुम्हें खेल सूझ रहा है।"*
सब बच्चे सहम गये। इन्हीं में एक थे गोविन्द सीताराम परमार्थ, जो आगे चलकर दादाराव परमार्थ के नाम से प्रसिद्ध हुए। दादाराव जी का जन्म नागपुर के इतवारी मौहल्ले में १९०४ में हुआ था। इनके पिता डाक विभाग में काम करते थे। केवल चार वर्ष की अवस्था में इनकी माँ का देहान्त हो गया। पिताजी ने दूसरा विवाह कर लिया।
*😥इस कारण से दादाराव को माँ के प्यार के बदले सौतेली माँ की उपेक्षा ही अधिक मिली। मैट्रिक में पढ़ते समय इनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हो गया। साइमन कमीशन के विरुद्ध आन्दोलन के समय पुलिस इन्हें पकड़ने आयी; पर ये फरार हो गये।*
पिताजी ने इन्हें परीक्षा देने के लिए पंजाब भेजा; पर परीक्षा पुस्तिका इन्होंने अंग्रेजों की आलोचना से भर दी। ऐसे में परिणाम क्या होना था, यह स्पष्ट है। दादाराव का सम्बन्ध क्रांतिवीर भगतसिंह तथा बलिदानी राजगुरू से भी था। सर्वश्री भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू की फाँसी के बाद हुई तोड़फोड़ में पुलिस इन्हें पकड़कर ले गयी थी।
*⛳जब इनका सम्बन्ध डॉक्टर केशव हेडगेवार से अधिक हुआ, तो ये संघ के लिए पूरी तरह समर्पित हो गये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारम्भ में डॉक्टर हेडगेवार के साथ काम करने वालों में बाबासाहब आप्टे तथा दादाराव परमार्थ प्रमुख थे। १९३० में जब डा. हेडगेवार साहब ने जंगल सत्याग्रह में भाग लिया, तो दादाराव भी उनके साथ गये तथा अकोला जेल में रहे।*
दादाराव बहुत उग्र स्वभाव के थे। दाँत बाहर निकले होने के कारण उनकी सूरत भी कुछ अच्छी नहीं थी; पर उनके भाषण बहुत प्रभावी होते थे। उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। भाषण देते समय वे थोड़ी देर में ही उत्तेजित हो जाते थे और अंग्रेजी बोलने लगते थे। दादाराव को संघ की शाखाएँ प्रारम्भ करने हेतु मद्रास, केरल, पंजाब आदि कई स्थानों पर भेजा गया।
*🤗डा. केशवराव हेडगेवार के प्रति उनके मन में अटूट श्रद्धा थी। कानपुर में एक बार शाखा पर डा. जी के जीवन के बारे में उनका भाषण था। इसके बाद उन्हें अगले स्थान पर जाने के लिए रेल पकड़नी थी; पर वे बोलते हुए इतने तल्लीन हो गये कि समय का ध्यान ही नहीं रहा, परिणामस्वरूप रेल छूट गयी।*
१९६३ में बरेली के संघ शिक्षण वर्ग में रात्रि कार्यक्रम में डा. हेडगेवार जी के बारे में दादाराव जी को बोलना था। कार्यक्रम का समय सीमित था। अतः वे एक घण्टे बाद बैठ गये; पर उन्हें रात भर नींद नहीं आयी। श्रद्धेय रज्जू भैया उस समय प्रान्त प्रचारक थे।
*🥺 रात दो बजे रज्जु भैया की नींद खुली, तो देखा दादाराव टहल रहे हैं। पूछने पर वे बोले - "तुमने डॉक्टर जी की याद दिला दी। ऐसा लगता है मानो बाँध टूट गया है और अब वह थमने का नाम नहीं ले रहा। फिर कभी मुझे रात में इस बारे में बोलने को मत कहना। दादाराव अनुशासन के बारे में बहुत कठोर थे।*
🔥स्वयं को कितना भी कष्ट हो; पर निर्धारित काम होना ही चाहिए। वे प्रचारकों को भी कभी-कभी दण्ड दे देते थे; पर अन्तर्मन से वे बहुत कोमल थे। १९६३ में सोनीपत के संघ शिक्षण वर्ग से लौटकर वे दिल्ली कार्यालय पर आये। वहीं उन्हें बहुत तेज बुखार हो गया। इलाज के बावजूद २७ जून, १९६३ को उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया।
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🪷🥁🙌🤩🎷🇮🇳👑⛳🥁👌
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